साधना का पथ: बिरसिंहपुर के 'गैवीनाथ' से चित्रकूट के 'रामघाट' तक—भक्ति और वन-संगीत की महायात्रा (भाग-२) - कालपथ: विश्व की ताजातरीन खबरें, ब्रेकिंग अपडेट्स और प्रमुख घटनाएँ

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गुरुवार

साधना का पथ: बिरसिंहपुर के 'गैवीनाथ' से चित्रकूट के 'रामघाट' तक—भक्ति और वन-संगीत की महायात्रा (भाग-२)

विंध्य वैभव: साधना के सोपान और चित्रकूट की दिव्य देहरी

"जहाँ समय ठहर जाता है और केवल महादेव का डमरू गूँजता है..."

ब्दों के इस चलचित्र का पर्दा अब विंध्य की गोद से निकलकर साधना और संकल्प के दुर्गम पथों की ओर बढ़ रहा है। यात्रा के इस दूसरे खंड (अध्याय ५ से ८) में हम रीवा की सीमा लांघकर श्रद्धा के उस केंद्र तक पहुँचेंगे जहाँ महादेव स्वयं भक्तों की प्रतीक्षा करते हैं। यह केवल एक भौगोलिक दूरी का तय होना नहीं है, बल्कि यह मन के भीतर की उन परतों को खोलने जैसा है जो हमें सांसारिकता से हटाकर सात्विकता की पराकाष्ठा की ओर ले जाती हैं। रात के सघन और रहस्यमयी सन्नाटे को चीरते हुए हमारा यह 'ज्ञान-काफिला' जब भगवान राम की तपोभूमि चित्रकूट की पावन देहरी पर दस्तक देगा, तब तक आप स्वयं को एक अलौकिक ऊर्जा के भंवर में घिरा हुआ पाएंगे, जहाँ हर सांस में 'सीताराम' का स्पंदन महसूस होता है।

अध्याय ५: रीवा से बिरसिंहपुर – आस्था की ओर पदचाप

रीवा नगर की व्यस्त सड़कों, आधुनिकता के कोलाहल और शहरी शोर को पीछे छोड़ते हुए हमारी बसें अब पुरानी बस स्टैंड से हर्दी-कपसा मार्ग की ओर मुड़ चुकी थीं। सूर्य देव अब अस्ताचलगामी थे, और क्षितिज पर फैली सिंदूरी आभा ऐसी मंत्रमुग्ध कर देने वाली थी मानो विंध्य की इस सनातनी धरा ने अपने प्रियतम के आगमन की प्रतीक्षा में मांग में रक्त-वर्ण का सिंदूर सजा लिया हो। खिड़की से बाहर का दृश्य अब पूर्णतः बदल चुका था—कंक्रीट के ठंडे जंगलों और धुएं भरी गलियों की जगह अब लहराते हुए सोने जैसे पीले खेतों और मिट्टी के खपरैल वाले शांत घरों ने ले ली थी, जहाँ से उठने वाला रसोई का धुआँ एक अलग ही ग्रामीण सुकून का अहसास दिला रहा था।

बिरसिंहपुर महादेव मंदिर
प्राचीन श्री गैवी नाथ महादेव मंदिर: विंध्य का गुप्त आध्यात्मिक खजाना

मार्ग में ग्रामीण परिवेश की अनुपम सुरम्यता मन को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित कर रही थी। सेमरिया पहुँचते-पहुँचते गोधूलि बेला हो चुकी थी, जहाँ हवा में उड़ते धूल के गुबार और चरागाहों से लौटती गायों के गले में बँधी टुनटुनाती घंटियों की आवाजें एक जीवंत और समृद्ध ग्रामीण संस्कृति का परिचय दे रही थीं। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे थे, अनंत नीले आकाश में तारों की बारात निकलने लगी थी और विंध्य की कंपकंपाती हुई ठंड अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराने लगी थी। छात्रों के भीतर एक अनजाना कौतूहल और महादेव से मिलने की छटपटाहट साफ़ देखी जा सकती थी।

रात लगभग ७:३० बजे हमारा काफिला श्री गैवी नाथ महादेव मंदिर, बिरसिंहपुर पहुँचा। यह स्थान विंध्य का एक ऐसा गुप्त रहस्य है, जिसे विंध्य की 'काशी' के नाम से भी श्रद्धापूर्वक पूजा जाता है। प्राचार्य श्री डी.पी. सिंह सर के अनुशासन का जादुई प्रभाव यहाँ स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुआ; ५२ छात्रों और १५ शिक्षकों का यह विशाल दल बिना किसी अवांछित शोर के, अत्यंत शांत और भक्तिपूर्ण भाव से हाथ-पैर धोकर मंदिर प्रांगण में प्रविष्ट हुआ। आरती में केवल १५ मिनट शेष थे, और मंदिर की प्राणवायु में एक ऐसा अलौकिक कंपन और सुगंध महसूस हो रही थी, जो केवल सिद्ध पीठों में ही संभव है।

प्राचार्य श्रीमान डी.पी. सिंह जी के कुशल नेतृत्व में, एस.बी. सिंह सर, आर.एल. कोल सर, आशीष मिश्र और नरेंद्र त्रिपाठी सर  के साथ सभी शिक्षकों ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित किया। जैसे ही पीतल के शंखों की गूँज उठी, पूरा वातावरण 'हर हर महादेव' के गगनभेदी जयघोष से आप्लावित हो गया। आचार्य जी ने अपने गंभीर और शास्त्रीय कंठ से सस्वर श्लोक का पाठ किया:

“कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्।
सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥”

— महादेव की आरती का वह दिव्य क्षण —

यहाँ का शिवलिंग एक विशाल प्राचीन शिला के नीचे प्राकृतिक रूप से स्थित है, जिसे 'गैवी नाथ' इसलिए पुकारा जाता है क्योंकि यह गुप्त रूप से स्वयं ही प्रकट हुए हैं। छात्रों ने न केवल दर्शन किए, बल्कि अपनी आँखों से देखा कि कैसे भक्ति का रस और भूगोल का विज्ञान यहाँ एक साथ एक ही बिंदु पर मिल जाते हैं। आरती की वह दिव्य आध्यात्मिक गूँज और निरंतर जलती धूनी की विशिष्ट महक ने दिन भर की समस्त थकान को क्षणभर में हर लिया। यहाँ छात्रों ने सात्विक और अल्पाहार ग्रहण किया और महादेव का परम आशीर्वाद लेकर उस यात्रा के लिए पुनः सन्नद्ध हुए जो रात के गहन सन्नाटे में होने वाली थी—एक ऐसी यात्रा जहाँ केवल अटूट श्रद्धा ही दीपक बनकर पथ-प्रदर्शक का कार्य करती है।

अध्याय ६: मझिगवां से चित्रकूट – वन का संगीत और आधी रात का सन्नाटा

रात के ९:०० बज चुके थे। बिरसिंहपुर से चित्रकूट का शेष मार्ग अब मझिगवां के अति-घने और पुरातन जंगलों के बीच से होकर गुजरना था। यह हमारी संपूर्ण यात्रा का सबसे रहस्यमयी, रोमांचकारी और कुछ हद तक रोमांचक चरण था। बस की शक्तिशाली हेडलाइट जब घने पेड़ों के आपस में गुंथे हुए झुरमुटों पर पड़ती, तो ऐसा प्रतीत होता मानो प्राचीन वन-देवता स्वयं सड़क के दोनों ओर प्रहरी बनकर खड़े हों और हमारा सूक्ष्मता से निरीक्षण कर रहे हों। सर्द हवाएं बस की खिड़की के कांच से टकराकर एक रहस्यमयी सीटी जैसी आवाज पैदा कर रही थीं, जो डरावनी नहीं बल्कि प्रकृति के एक अछूते राग जैसी संगीतमय महसूस हो रही थी।

वन का चलचित्र: एक वैज्ञानिक और दार्शनिक संवाद

खिड़की के बाहर सन्नाटा इतना पारदर्शी और गहरा था कि बस के टायर की घर्षण ध्वनि भी किसी संगीत के 'ताल' जैसी लग रही थी। मार्ग में छोटे-छोटे अदृश्य झरने और पहाड़ी नाले रात के अंधेरे में बस की लाइट पड़ते ही चाँदी की चमकदार लकीर जैसे कौंध रहे थे। अंग्रेजी के प्रकांड विद्वान अखिलेश पाण्डेय सर ने प्रकृति के इस विहंगम और जीवंत दृश्य को अपनी विशिष्ट काव्यात्मक शैली में **'Nature's Unspoken Poetry'** (प्रकृति की मूक कविता) का नाम दिया। उन्होंने छात्रों को समझाया कि कैसे महान कवि विलियम वर्ड्सवर्थ ने प्रकृति को संसार का सबसे बड़ा शिक्षक माना था, और आज ये छात्र उसे साक्षात् अनुभव कर रहे हैं।

इस घने जंगल में जैव-विविधता का असीम भंडार छिपा है। श्री एस.बी. सिंह सर (जीव विज्ञान व्याख्याता) ने छात्रों को धीमी और गंभीर आवाज में बताया कि यह क्षेत्र न केवल पेड़ों का समूह है, बल्कि यह बाघों और तेंदुओं का एक महत्वपूर्ण 'गलियारा' (Corridor) भी है। छात्रों के भीतर एक ओर आदिम डर था और दूसरी ओर अज्ञात उत्साह का एक अद्भुत मिश्रण, मानो वे किसी आधुनिक समय से निकलकर सीधे त्रेतायुग की अरण्य-यात्रा पर निकल पड़े हों।

गायत्री शक्तिपीठ चित्रकूट
माँ गायत्री शक्तिपीठ: जहाँ रात की थकान ने शांति की गोद में विश्राम पाया।

रात के ११:५० बज रहे थे, जब पूरी दुनिया गहरी निद्रा के आगोश में थी, हमारा यह अटूट 'ज्ञान-काफिला' पवित्र चित्रकूट की पावन सीमा में प्रविष्ट हुआ। एक सात्विक भोजनालय में छात्रों के लिए गरमा-गरम और शुद्ध शाकाहारी भोजन की व्यवस्था की गई थी। उस हाड़ कंपा देने वाली ठंड में वह गर्म भोजन किसी दिव्य 'अमृत' से कम नहीं लगा। भोजन के उपरांत हम माता गायत्री शक्तिपीठ पहुँचे, जहाँ प्राचार्य जी की सूक्ष्म और उत्कृष्ट पूर्व-योजना के अनुसार दो विशाल हॉल में रजाई-गद्दों की समुचित व्यवस्था थी। रात के २:०० बज रहे थे, आँखों में थकान थी पर मन में अगले दिन की जिज्ञासा की वह ज्योति जल रही थी जो सोने नहीं दे रही थी। फिर भी, अगले दिन की असीमित ऊर्जा के संचय के लिए सभी अंततः विश्राम की शीतल गोद में चले गए।

अध्याय ७: चित्रकूट का ब्रह्ममुहूर्त – मंदाकिनी और रामघाट

प्रातः ५:०० बजे: जब आकाश के विशाल पट पर शुक्र तारा अपनी पूर्ण देदीप्यमान आभा के साथ चमक रहा था, पड़री और हड़बड़ो के ये नन्हें जिज्ञासु छात्र मंदाकिनी के पावन तट 'रामघाट' की सीढ़ियों पर खड़े थे। दिसंबर की वह ठिठुरती हुई कंपकपाती सुबह थी, ओस की बूंदें फूलों और पत्तों पर मोती बनकर जम रही थीं, पर इन छात्रों के भीतर अपनी संस्कृति को जानने की आस्था की गर्मी सब पर भारी थी। चारों ओर से गूँजती मंदिरों की घंटियाँ और मंत्रोच्चार के स्वर सुबह की हवा में एक दिव्य पवित्रता घोल रहे थे।

चित्रकूट रामघाट
मंदाकिनी का रामघाट: जहाँ हर लहर में राम-नाम का संगीत है।

मंदाकिनी का शीतल जल अत्यंत शांत और गरिमामयी भाव से बह रहा था। छात्रों ने जैसे ही उस पवित्र धारा में डुबकी लगाई, उनकी रगों में स्फूर्ति, ऊर्जा और भक्ति की एक नई लहर दौड़ गई। घाट पर कतारबद्ध तरीके से जलते अनगिनत दीपकों की स्वर्णिम आभा जल की सतह पर थिरक रही थी, मानो आकाश के तारे धरती की इस पवित्र नदी में स्नान करने उतर आए हों। आचार्य आशीष मिश्र ने जल की अंजलि भरते हुए और सूर्य को अर्घ्य देते हुए स्कंद पुराण का यह अति-प्राचीन श्लोक सुनाया:

“मन्दाकिन्यास्तु यद्वारि सर्वपापहरं शुभम्।
तत्र स्नात्वा नरो याति वैकुण्ठं नात्र संशयः॥”
(अर्थ: मंदाकिनी का यह पवित्र जल समस्त पापों को नष्ट करने वाला और परम कल्याणकारी है। यहाँ स्नान करने वाला मनुष्य निःसंदेह वैकुंठ धाम को प्राप्त करता है।)

स्नान के पश्चात सभी यात्रियों ने नौका विहार का आनंद लिया। नावों की कतारें, पानी की छप-छप और चारों ओर गूँजते 'सीताराम' के सुरीले संकीर्तन ने एक ऐसा दिव्य दृश्य रचा जो किसी प्राचीन धार्मिक चलचित्र के 'क्लाइमेक्स' जैसा भव्य और मार्मिक था। यहीं रामघाट के समीप ही श्री एस.बी. सिंह सर ने छात्रों का ध्यान विश्वविख्यात 'सदगुरु नेत्रालय' की ओर आकर्षित किया। उन्होंने विस्तार से बताया कि कैसे परम पूज्य रणछोड़दास जी महाराज की प्रेरणा से यह महान संस्थान सेवा और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का एक वैश्विक केंद्र बना है। छात्रों ने आज जाना कि सच्चे अध्यात्म का असली और अंतिम अर्थ 'परसेवा' (दूसरों की सेवा) ही है।

अध्याय ८: कामदगिरि परिक्रमा – आस्था की ५ कोस की यात्रा

स्नान और पौष्टिक अल्पाहार के पश्चात हमारा दल श्रीमन्नारायण श्री कामतानाथ स्वामी के मुख्य और भव्य मंदिर पहुँचा। यहीं से शुरू हुई चित्रकूट की विश्व-प्रसिद्ध ५ किलोमीटर (५ कोस) की वह पावन परिक्रमा, जो मनुष्य के संकल्प और श्रद्धा की परीक्षा लेती है। यह मार्ग केवल धूल और पत्थरों पर पैदल चलने का रास्ता नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर झांकने और आत्म-साक्षात्कार करने की एक सूक्ष्म यात्रा है। पूरे मार्ग में 'कामदगिरि' पर्वत (जिसे स्वयं साक्षात् भगवान राम का विग्रह स्वरूप माना जाता है) निरंतर हमारे दाहिनी ओर रहकर हमें अपनी आध्यात्मिक छाया प्रदान कर रहा था।

कामतानाथ स्वामी
श्रीमन् कामतानाथ स्वामी: चित्रकूट के अधिष्ठाता देव का दिव्य स्वरूप।

परिक्रमा मार्ग के जीवंत साक्षी और प्रसंग

भरत मिलाप मंदिर: परिक्रमा के दौरान जब हम 'भरत मिलाप' स्थान पर पहुँचे, तो आचार्य जी ने वह अत्यंत भावुक कर देने वाला स्थान दिखाया जहाँ के कठोर पत्थरों पर आज भी भरत और राम के प्रेमपूर्ण मिलन के पावन पदचिह्न अंकित माने जाते हैं। यह देखकर कि कैसे निश्चल प्रेम में कठोर पत्थर भी मोम की तरह पिघल सकते हैं, अनेक छात्रों की आँखें सजल हो उठीं।

लक्ष्मण पहाड़ी और वानर सेना: ऊँचाई पर स्थित वह 'लक्ष्मण पहाड़ी' दिखाई दी जहाँ से शेषनाग के अवतार लक्ष्मण जी माता सीता और प्रभु राम की सुरक्षा के लिए दिन-रात पहरा देते थे। संदीप तिवारी सर ने यहाँ की रणनीतिक ऊंचाई (Strategic Height) का सामरिक और भौगोलिक महत्व विस्तार से समझाया। वहीं मार्ग भर बंदरों की विशाल सेना छात्रों के साथ-साथ ऐसे चल रही थी मानो वे हमारे इस 'ज्ञान-काफिले' के प्राचीन रक्षक हों।

परिक्रमा के अंत तक सूर्य देव अपने पूर्ण तेजस्वी रूप में आकाश के मध्य सिर पर आ चुके थे, पर आश्चर्यजनक रूप से किसी भी छात्र के चेहरे पर थकान का नामो-निशान तक नहीं था। ५ किलोमीटर की यह पैदल यात्रा इन छात्रों के लिए 'स्टैमिना' (सहनशक्ति), अनुशासन और 'श्रद्धा' का एक अनूठा और अविस्मरणीय जीवन-पाठ बन गई। 'कामतानाथ की जय' के निरंतर गूँजते उद्घोष से संपूर्ण चित्रकूट का आकाश गुंजायमान हो रहा था। आचार्य जी ने मार्ग के समापन पर रामचरितमानस की यह कालजयी चौपाई का मधुर गान किया, जिसने सबके हृदयों को शांति प्रदान की:

“कामदगिरि राम प्रसादा। अवलोकित नशत बिषादा॥”
(अर्थात् कामदगिरि के दर्शन मात्र से ही जीवन के सारे मानसिक विषाद और दुख जड़ से नष्ट हो जाते हैं।)

अब हमारी यात्रा का यह खंड यहाँ संपन्न होता है, पर हमारी उत्सुकता अभी शांत नहीं हुई है। अब हमें अपनी अगली और अंतिम मंजिल—'सती अनुसूया' के मातृत्व की छाया और 'गुप्त गोदावरी' के उन गहरे भू-गर्भित रहस्यों की ओर बढ़ना था, जहाँ प्रकृति ने विज्ञान की सबसे जटिल और रहस्यमयी पहेलियाँ आज भी सुरक्षित छिपा रखी हैं।

स्मृति-मंजूषा: यात्रा के अनमोल क्षण

कथा के अंतिम शिखर की ओर...

"अंतिम भाग में हम पढ़ेंगे—गुफाओं का विज्ञान, सती अनुसूया की शक्ति और उस भावुक विदाई की दास्तां..."

आचार्य आशीष मिश्र
आचार्य आशीष मिश्र संस्कृत अतिथि शिक्षक | विंध्य धरा के साहित्यकार

यह संस्मरण विंध्य की शैक्षणिक और आध्यात्मिक चेतना को जीवंत रखने का एक प्रयास है।

प्रस्तुति: कालपथ डिजिटल आर्काइव

© २०२६ | विंध्य वैभव महा-श्रृंखला

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