चित्रकूट दर्शन: शैक्षणिक भ्रमण डायरी - पड़री से रीवा तक की ऐतिहासिक यात्रा (भाग १)

AI वॉयस: कालपथ न्यूज़ इंजन

विंध्य वैभव: विंध्य की माटी और आस्था का 'महा-चलचित्र'

"जहाँ विज्ञान का तर्क और अध्यात्म की श्रद्धा एक सूत्र में बँध जाते हैं"

"विन्ध्याद्रिपादतले प्रवहतु सुरधुनी समं सोभा।
ज्ञानविज्ञानसहितं यात्रा सफला भवतु नः शुभा॥"

(विंध्याचल के चरणों में बहती हुई शोभा और ज्ञान-विज्ञान से युक्त हमारी यह यात्रा शुभ और सफल हो।)

ह केवल एक यात्रा संस्मरण नहीं, बल्कि विंध्य की माटी, ज्ञान के आलोक और आस्था के अटूट विश्वास से बुना गया एक 'चलचित्र' है। इसे पढ़ते समय आपके कानों में बसों के इंजनों की गूँज सुनाई देगी और आपकी आँखों के सामने विंध्य की वादियाँ एक-एक कर उभरेंगी। इस लेखन की गहराई में वह तड़प है जो एक शिक्षक अपने शिष्यों को प्रकृति के सान्निध्य में दिखाना चाहता है। यह एक ऐसी मानस-यात्रा है जहाँ शब्द चित्र बन जाते हैं और वाक्य भावनाओं की लहरें। आइए, १२ अध्यायों की इस विस्तृत श्रृंखला के प्रथम भाग (अध्याय १ से ४) में प्रवेश करते हैं, जहाँ से हमारी स्मृतियों का कारवां शुरू होता है।

अध्याय १: मंगलाचरण और प्रस्थान – 'पड़री' से 'हड़बड़ो' तक

काल गणना: दिनांक २४ दिसंबर २०२५। मार्गशीर्ष पूर्णिमा के पश्चात पौष मास की चतुर्थी तिथि। सूर्य देव अपनी संपूर्ण तेजस्वी रश्मियों के साथ धनु राशि में विराजमान होकर चराचर जगत को नव-ऊर्जा से अभिसिंचित कर रहे थे। आकाश का नीला विस्तार और धरती की हरियाली मानो किसी मांगलिक उत्सव की तैयारी कर रहे थे। प्रकृति का कण-कण उस 'अदृश्य शक्ति' के स्वागत में खड़ा था जो इस यात्रा की नियंता थी।

प्राचार्य महोदय
साक्षात् अनुशासन: प्राचार्य श्री डी.पी. सिंह सर, जिनके मार्गदर्शन में यह संकल्प यात्रा सिद्ध हुई।

दोपहर के ठीक १२:३० बजे थे। शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय पड़री (सीधी) का विशाल प्रांगण आज किसी उत्सव के केंद्र जैसा जीवंत था। १८ बालकों और ३४ बालिकाओं के बैगों में केवल वस्त्र नहीं, बल्कि जिज्ञासाओं के अनगिनत पुलिंदे भरे थे। हर बच्चे की आँखों में एक नई दुनिया देखने का कौतूहल था। १५ शिक्षकों का 'अनुशासित दस्ता', जिसमें अनुशासन के साक्षात् विग्रह प्राचार्य श्री डी.पी. सिंह सर और ज्ञान के अनथक यात्री श्री एस.बी. सिंह सर (जीव विज्ञान व्याख्याता) अपनी सूक्ष्म योजना को अंतिम रूप दे रहे थे। हर शिक्षक अपनी जिम्मेदारी को एक यज्ञ की दीक्षा की तरह स्वीकार कर रहा था।

जैसे ही दो विशाल बसों ने स्टार्ट होने की गूँज पैदा की, वातावरण में 'ॐ'कार का गगनभेदी घोष हुआ। वह स्वर केवल कंठों से नहीं, बल्कि आत्माओं से निकला था। बस के पहियों ने जैसे ही गति पकड़ी, छात्रों के चेहरों पर एक अनजानी प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। खिड़कियों से बाहर हाथ हिलाते ग्रामीण और दुआएं देते हाथ मानो हमारी सुरक्षा का कवच बन गए थे।

बस अभी १५ किलोमीटर ही चली थी कि शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय हड़बड़ो के उत्साही छात्रों का काफिला सामने खड़ा मिला। यहाँ 'शैक्षणिक संगम' हुआ। यह दृश्य वैसा ही था जैसे दो छोटी जलधाराएं मिलकर एक विशाल नदी का रूप ले लेती हैं। प्राचार्य जी के एक सूक्ष्म संकेत पर दोनों विद्यालयों के छात्र ऐसे मिल गए जैसे संगम पर गंगा में यमुना विलीन हो जाती है। अब न कोई पराया था, न कोई अनजान; सब एक ही 'विंध्य-परिवार' के सदस्य थे। यहाँ से ६७ यात्रियों का यह विशाल 'ज्ञान-रथ' सीधी की ओर बढ़ा। खिड़की से बाहर भागते हुए पेड़ और धूल के गुबार मानो हमें पीछे छोड़कर अतीत की ओर जा रहे थे और हम भविष्य की स्मृतियाँ गढ़ने की ओर तेजी से बढ़ रहे थे।

अध्याय २: सीधी से गुढ़ – सोन की लोरी और बढ़ौरा का वैभव

मंदाकिनी तट
पवित्र संगम: विंध्य की नदियों के तट पर ज्ञान का जीवंत दर्शन।

जैसे ही बस सीधी के शहरी शोर को पीछे छोड़कर आगे बढ़ी, प्रकृति ने अपना आंचल फैलाना शुरू कर दिया। विंध्य की ऊँची-नीची ढलानें और घने वन क्षेत्र हमारे स्वागत में झुकते हुए प्रतीत हो रहे थे। मार्ग में श्री एस.बी. सिंह सर ने अपनी चिरपरिचित ओजस्वी शैली में छात्रों को संबोधित करते हुए विंध्य की भौगोलिक महत्ता समझानी शुरू की। उन्होंने बताया कि यह भूमि केवल पत्थर नहीं, बल्कि औषधियों और रत्नों की जननी है।

अचानक बस की बाईं खिड़की से 'बढ़ौरा शिव मंदिर' के शिखर के दर्शन हुए। यह मंदिर केवल पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि विंध्य की सांस्कृतिक विरासत का रक्षक है। आचार्य आशीष मिश्र (संस्कृत शिक्षक) ने वातावरण की पवित्रता को समझते हुए अपने सस्वर और गंभीर कंठ से शिव स्तुति का पाठ किया:

“विश्वेश्वरं महादेबं नीलकण्ठं सदाशिवम्। नमामि शिरसा देवं किमन्यैः दैवतैः मम॥”
(अर्थ: मैं उन विश्वेश्वर, महादेव, नीलकंठ और सदाशिव को प्रणाम करता हूँ। उनके अतिरिक्त मेरा अन्य कोई देव नहीं है।)

बढ़ौरा का यह मंदिर मौर्यकालीन और कलचुरी कालीन स्थापत्य की मूक गवाही देता है। इसकी नक्काशी में छिपे इतिहास को छात्रों ने श्रद्धा के साथ निहारा। जैसे ही बस सीधी से गुढ़ की ओर चढ़ाई चढ़ने लगी, 'सोन नदी' की विशाल जलधारा ने हमारी अगवानी की। पहाड़ों के बीच से बहती सोन की वह रजत धारा ऐसी लग रही थी मानो धरती का कोई सुरीला राग हो। श्री आर.एल. कोल सर ने बताया कि कैसे यह नदी सदियों से विंध्य की जीवनरेखा बनी हुई है। नीचे जल की कल-कल ध्वनि ऐसी प्रतीत हो रही थी मानो सोन नदी इन छोटे बच्चों को 'लाड भरी लोरियां' सुनाकर उनकी थकान हर रही हो और उन्हें आने वाले अध्यायों के लिए तैयार कर रही हो।

अध्याय ३: मोहनिया टनल – जहाँ विज्ञान और पहाड़ का साक्षात्कार

रीवा सीधी टनल
आधुनिक सेतु: मोहनिया टनल - जहाँ मानव श्रम ने असंभव को संभव बनाया।

यात्रा का सबसे प्रतीक्षित और रोमांचक मोड़ तब आया, जब हम 'मोहनिया घाटी' के पास पहुँचे। यहाँ प्रकृति के दुर्गम अवरोध और मानव की मेधा के बीच एक अद्भुत समझौता हुआ है—रीवा-सीधी टनल। यह स्थान उस संघर्ष का प्रतीक है जहाँ पहाड़ ने अपनी दृढ़ता दिखाई, तो मनुष्य ने अपनी बुद्धि की तीव्रता। जैसे ही बस टनल के विशाल प्रवेश द्वार (Portal) पर पहुँची, सबकी आँखें फटी रह गईं। गणित के शिक्षक संदीप तिवारी सर और रसायन शास्त्र के प्रकांड विद्वान नरेंद्र कुमार त्रिपाठी सर ने बस रुकवाकर छात्रों को इस इंजीनियरिंग के 'कोहिनूर' की बारीकियों से परिचित कराया।

विज्ञान और तकनीक का वैभव

संरचनात्मक श्रेष्ठता

यह भारत की सबसे चौड़ी ६-लेन टनल है। इसकी कुल लंबाई २.२८ किलोमीटर है। यह टनल 'न्यू ऑस्ट्रियन टनलिंग मेथड' (NATM) से निर्मित है, जो दुनिया की सबसे सुरक्षित तकनीक मानी जाती है। इसमें चट्टानों की प्राकृतिक शक्ति का उपयोग किया जाता है।

वेंटिलेशन और सुरक्षा

छत पर लगे विशाल 'जेट फैन्स' निरंतर हवा के दबाव को नियंत्रित करते हैं। संदीप सर ने बताया कि कैसे सेंसर गैसों के स्तर को मापते हैं और पंखों की गति को घटाते-बढ़ाते हैं। यह 'मैकेनिकल ब्रीदिंग' जैसा है।

छात्रों ने देखा कि कैसे 'आर्क डिजाइन' (मेहराब) के माध्यम से पहाड़ के लाखों टन वजन को टनल की दीवारों पर समान रूप से वितरित किया गया है। यह विज्ञान का वह आधुनिक मंदिर था जहाँ पत्थरों ने तकनीक के आगे अपना सिर झुका दिया था। अंधेरे से उजाले की ओर बढ़ने की यह प्रक्रिया छात्रों के लिए केवल यात्रा नहीं, बल्कि एक गहरा जीवन-दर्शन बन गई। जहाँ पहले इस खतरनाक घाटी को पार करने में ४५ मिनट और भारी ईंधन खर्च होता था, अब मात्र ३ मिनट में सुरक्षित यात्रा पूर्ण होती है।

अध्याय ४: गुढ़ से रीवा – एशिया का सूरज और विंध्य का वैभव

मोहनिया टनल के अंधेरे से निकलकर जैसे ही हम उजाले में आए, गुढ़ के पहाड़ों पर 'नीला समंदर' बिछा हुआ दिखा। यह पानी का समंदर नहीं, बल्कि 'एशिया का सबसे बड़ा सोलर पावर प्लांट' था। श्री नरेंद्र त्रिपाठी सर ने छात्रों को बताया कि रीवा अल्ट्रा मेगा सोलर (RUMS) ७५० मेगावाट की क्षमता वाला प्लांट है। सौर ऊर्जा की लाखों फोटोवोल्टिक प्लेट्स ऐसी लग रही थीं मानो आसमान का एक विशाल टुकड़ा जमीन पर बिछ गया हो। आचार्य जी ने यहाँ ऋग्वेद का स्मरण कराया: "सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च" (सूर्य इस चराचर जगत की आत्मा है)। यहाँ की बिजली दिल्ली मेट्रो तक को दौड़ाती है, जो विंध्य के लिए गौरव का विषय है।

रीवा सोलर प्लांट
ऊर्जा का महाकुंभ: ७५० मेगावाट का सोलर प्लांट, विंध्य की नई पहचान।

यहीं पास में देउर कोठार के बौद्ध स्तूपों का जिक्र करते हुए आचार्य जी ने बताया कि यह मौर्य सम्राट अशोक के काल की याद दिलाता है। पत्थरों पर उकेरी गई लिपियाँ बताती हैं कि यह क्षेत्र कभी विश्व शांति और ज्ञान का केंद्र था। रीवा नगर की सीमाओं में प्रवेश करते ही दृश्यों का एक 'स्लाइड शो' चलने लगा। चिरहुला नाथ मंदिर के दर्शन हुए, जो विंध्य का वह आध्यात्मिक केंद्र है जहाँ के हनुमान जी रीवा के रक्षक माने जाते हैं। रानी तालाब ने जल प्रबंधन का वह प्राचीन और उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया, जहाँ मंदिर और सरोवर का अद्भुत संतुलन है।

रीवा: इतिहास की धरोहर

रीवा राजमहल सफेद शेरों की जन्मस्थली का ऐतिहासिक साक्ष्य है। इसी मिट्टी से 'मोहन' (प्रथम सफेद शेर) निकला था, जिसने रीवा को वैश्विक मानचित्र पर अंकित किया। टीआरएस कॉलेज शिक्षा का वह वटवृक्ष है जहाँ से विंध्य की कई पी़ढ़ियों ने मेधा का अमृत पान किया। वहीं अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट रीवा के आकाश में उड़ते हुए पंखों की नई पहचान है, जो प्रगति का साक्षात् प्रमाण है।

रीवा की सड़कों पर बस की रफ्तार के साथ छात्रों के मन में अपने क्षेत्र के प्रति सम्मान बढ़ता जा रहा था। उन्हें समझ आ रहा था कि विंध्य केवल पिछड़ा इलाके नहीं, बल्कि विज्ञान और विरासत का अद्भुत संगम है। शाम ढल रही थी, क्षितिज पर सूर्य देव अपनी विश्राम की वेला में थे, और हमारी बसें अब अपनी अगली मंजिल—'बिरसिंहपुर' की ओर बढ़ रही थीं, जहाँ महादेव का स्वयंभू स्वरूप हमारा इंतजार कर रहा था। उत्साह का ज्वार अब भक्ति में बदलने लगा था।

यात्रा के अगले पड़ावों का आनंद लें

"कथा अभी शेष है... बिरसिंहपुर के गैवीनाथ महादेव और चित्रकूट के कामतानाथ स्वामी आपका आह्वान कर रहे हैं!"

आचार्य आशीष मिश्र
आचार्य आशीष मिश्र संस्कृत अतिथि शिक्षक वर्ग-१ | विंध्य संस्कृति के अनन्य साधक

यह संस्मरण उनके द्वारा विंध्य की नई पी़ढ़ी को अपनी विरासत से जोड़ने का एक विनम्र प्रयास है।

प्रस्तुति: कालपथ डिजिटल

© २०२६ | विंध्य वैभव श्रृंखला

संपादकीय सत्यनिष्ठा प्रमाणित
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पाठकों की राय

आचार्य आशीष मिश्र
Dukan
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