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73,000 अतिथि शिक्षकों का भविष्य: MP हाई कोर्ट चीफ जस्टिस बेंच में ऐतिहासिक सुनवाई और सुप्रीम कोर्ट की निर्णायक जंग

आचार्य आशीष मिश्र शुक्रवार, सितंबर 25, 2026 1 MIN READ

मध्य प्रदेश के शासकीय विद्यालयों में वर्षों से अल्प मानदेय पर अपनी सेवाएं दे रहे लगभग 73,000 अतिथि शिक्षकों के भविष्य का फैसला अब विधिक तराजू पर निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की मुख्य पीठ में माननीय मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली युगलपीठ के समक्ष विचाराधीन यह संयुक्त रिट याचिका केवल सेवा शर्तों की लड़ाई नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 39(d) के तहत मानवीय गरिमा, आजीविका के अधिकार और संस्थागत शोषण के विरुद्ध एक ऐतिहासिक संवैधानिक संघर्ष है।

भाग 1: प्रकरण का आधिकारिक विधिक विवरण (Case Dossier)

मध्य प्रदेश के अतिथि शिक्षकों के संपूर्ण सेवा संवर्ग के अधिकारों को निर्धारित करने वाले इस प्रमुख वाद का न्यायिक विवरण इस प्रकार है:

  • प्रकरण का स्वरूप: संयुक्त रिट याचिका (Writ Petition under Article 226 of the Constitution of India)
  • वाद शीर्षक (Cause Title): विकास कुमार नंदानिया, मुकेश जोशी एवं अन्य बनाम मध्य प्रदेश शासन, स्कूल शिक्षा विभाग व अन्य
  • प्रतिनिधित्व संवर्ग: मध्य प्रदेश स्कूल शिक्षा विभाग एवं जनजातीय कार्य विभाग के अंतर्गत कार्यरत लगभग 73,000 पंजीकृत अतिथि शिक्षक
  • माननीय न्यायपीठ (Bench): माननीय मुख्य न्यायाधीश एवं माननीय न्यायमूर्ति विवेक जैन की खंडपीठ (उच्च न्यायालय मध्य प्रदेश, मुख्य पीठ जबलपुर)
  • याचिकाकर्ताओं के मुख्य अधिवक्ता: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री पुष्पेंद्र शाह एवं अधिवक्ता श्री विनायक प्रसाद शाह
  • वर्तमान विधिक स्थिति: अंतिम सुनवाई, अंतरिम तर्कों और राज्य शासन के विधिक प्रत्युत्तर एवं नीतिगत समीक्षा के अंतिम चरण में विचाराधीन।

पूर्व के संदर्भगत व नजीर बने न्यायिक निर्णय (Precedents & Case Laws):

  1. Writ Petition No. 3137/2024 (डिवीजन बेंच, जबलपुर): प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक अतिथि शिक्षकों के नियमितीकरण की मांग। इसे खंडपीठ ने भर्ती नियम-2018 की वैधानिकता और सचिव, कर्नाटक राज्य बनाम उमा देवी (2006) के प्रतिबंधात्मक सिद्धांतों के आधार पर खारिज किया था।
  2. Writ Petition No. 15639/2023 (शिव कुमार कचेर बनाम म.प्र. राज्य): एकल पीठ ने WP No. 3137/2024 की नजीर का हवाला देते हुए नियमितीकरण की राहत को नीतिगत मामला मानकर अस्वीकार किया।
  3. Writ Appeal No. 386/2016 एवं W.P. No. 8947/2016 (ग्वालियर खंडपीठ): उच्च न्यायालय का स्थापित विधि-सिद्धांत कि "एक संविदा/अतिथि कर्मी के स्थान पर दूसरे समान प्रकृति के तदर्थ कर्मी को प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता; सेवामुक्ति केवल नियमित भर्ती से ही संभव है।"
  4. Writ Petition No. 6159/2022 (प्रदीप कुमार यादव एवं अन्य बनाम म.प्र. राज्य): वार्षिक सत्यापन और नए सिरे से आवेदन के नाम पर कार्यरत पात्र अतिथि शिक्षकों के उत्पीड़न पर रोक तथा नियमित नियुक्ति होने तक सेवा निरंतरता का संरक्षण।
  5. Writ Appeal No. 1978/2025 एवं W.P. No. 4298/2024: स्थानांतरण नीति के तहत नियमित शिक्षकों के आगमन पर अतिथि शिक्षकों को बिना वैकल्पिक पदस्थापना दिए GFMS पोर्टल से सीधे 'Fallen Out' करने की मनमानी प्रशासनिक प्रक्रिया को चुनौती।

भाग 2: संपूर्ण विधिक कार्यवाही एवं पृष्ठभूमि (2018 से वर्तमान तक)

मध्य प्रदेश में अतिथि शिक्षकों की वर्तमान स्थिति का मूल कारण वर्ष 2018 में बनी दोषपूर्ण नीतियां हैं। इस पूरे विधिक घटनाक्रम को समझना आवश्यक है:

2018 का कड़वा सच और 8 वर्ष का विधिक ठहराव:

वर्ष 2018 में जब स्कूल शिक्षा विभाग ने "मध्य प्रदेश राज्य स्कूल शिक्षा सेवा (शैक्षणिक संवर्ग) सेवा शर्तें एवं भर्ती नियम, 2018" अधिसूचित किए, तो वर्षों से कार्यरत अतिथि शिक्षकों ने नियमितीकरण और सेवा संविलियन की मांग को लेकर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। राज्य शासन ने विधिक पेंच फंसाते हुए भर्ती नियमों के नियम 11(7)(b)(iv) में 3 शैक्षणिक सत्र एवं न्यूनतम 200 दिवस कार्य करने वाले अतिथि शिक्षकों को 25% क्षैतिज आरक्षण (Horizontal Reservation) देने का प्रावधान जोड़ दिया।

खंडपीठ ने इसे शासन की "पर्याप्त विधिक रियायत" मानते हुए नियमितीकरण की मुख्य मांग को खारिज कर दिया। इसके बाद 2018 से 2026 तक लगभग आठ वर्षों तक एकल पीठों में नियमितीकरण से जुड़े केस विरले ही स्वीकार हुए और अधिकांश को 2018 के इसी आदेश के आधार पर निरस्त किया जाता रहा।

आठ वर्ष बाद क्यों खुला यह विधिक महासंयोग?

वर्ष 2018 के बाद यह पहला अवसर है जब मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ में विकास कुमार नंदानिया व अन्य की याचिका के माध्यम से प्रकरण केवल आरक्षण तक सीमित नहीं है। अब इसे समान कार्य के लिए समान वेतन, सवैतनिक अवकाश, मातृत्व लाभ, अव्यावहारिक उपस्थिति नियमों के निरस्तीकरण और 62 वर्ष तक सेवा सुरक्षा के व्यापक संवैधानिक धरातल पर सुना जा रहा है। यही आदेश सर्वोच्च न्यायालय में अंतिम न्याय का ठोस आधार (Launchpad) बनेगा।

न हि सत्यात्परो धर्मो नानृतात्पातकं परम्।
धर्मस्य मूलं सत्यं हि तस्मात्सत्यं न लोपयेत्॥

भाग 3: वर्तमान प्रकरण में उठाए गए मुख्य विधिक व संवैधानिक बिंदु

माननीय खंडपीठ के समक्ष याचिकाकर्ताओं द्वारा राज्य शासन की कार्यप्रणाली के विरुद्ध निम्नलिखित गंभीर संवैधानिक प्रश्न उठाए गए हैं:

क्या अतिथि शिक्षकों को समान कार्य का समान वेतन मिलना विधिक अधिकार है?

याचिकाकर्ताओं द्वारा आधिकारिक समय-सारणी, परीक्षा ड्यूटी आदेश और मूल्यांकन प्रपत्रों के माध्यम से प्रमाणित किया गया है कि वे नियमित शिक्षकों के समान ही पूर्ण कालखंड, समान पाठ्यक्रम, बोर्ड परीक्षा मूल्यांकन और निर्वाचन जैसे राष्ट्रीय कार्य करते हैं। अतः उन्हें नियमित शिक्षकों के आरंभिक वेतनमान का न्यूनतम न देना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 39(d) (समान कार्य के लिए समान वेतन) का खुला उल्लंघन है।

क्या 90% डिजिटल उपस्थिति का नियम मनमाना है?

GFMS पोर्टल के माध्यम से ग्रामीण और वनांचल क्षेत्रों की गंभीर सर्वर व नेटवर्क समस्याओं को नजरअंदाज करते हुए 90% अनिवार्य डिजिटल उपस्थिति की शर्त पर मानदेय काटना प्रशासनिक मनमानी है। प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत यह नियम संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत मनमाना (Arbitrary) और असंवैधानिक है।

क्या महिला अतिथि शिक्षकों को सवैतनिक मातृत्व अवकाश देय है?

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा म्युनिसिपल कॉरपोरेशन ऑफ दिल्ली बनाम फीमेल वर्कर्स (2000) में स्थापित कानून और मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 के तहत किसी भी महिला कर्मी को उसकी संविदा या तदर्थ स्थिति के आधार पर मातृत्व अवकाश से वंचित नहीं किया जा सकता। राज्य शासन द्वारा इस लाभ को रोकना संविधान के अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार) का हनन है।

क्या पोर्टल से सीधे 'Fallen Out' करना न्यायालय की अवमानना है?

एकल पीठों का स्पष्ट आदेश रहा है कि किसी शाला में नियमित शिक्षक या स्थानांतरित कर्मी के आने पर वहां पहले से कार्यरत अतिथि शिक्षक को सीधे नहीं हटाया जाएगा। उसे नजदीकी रिक्त पद वाली शाला में वैकल्पिक समायोजन का लिखित विकल्प दिया जाना अनिवार्य है, और केवल उसके इनकार पर ही कार्यमुक्त किया जा सकता है। स्कूल शिक्षा विभाग पोर्टल पर सीधे 'Fallen Out' करके उच्च न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन कर रहा है।

भाग 4: उच्च न्यायालय बनाम सर्वोच्च न्यायालय — शक्तियों का विधिक विश्लेषण

अतिथि शिक्षकों के लिए यह समझना अनिवार्य है कि उच्च न्यायालय की सीमाएं क्या हैं और सर्वोच्च न्यायालय में यह प्रकरण कैसे निर्णायक सिद्ध होगा:

विधिक व संवैधानिक तुलनात्मक बिंदु उच्च न्यायालय (High Court - Art. 226) सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court - Art. 142 & 136)
संवैधानिक क्षेत्राधिकार केवल पूर्व-विद्यमान राज्य सेवा नियमों की वैधता व क्रियान्वयन की जांच कर सकता है। संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत "पूर्ण न्याय" (Complete Justice) करने की असीम और सर्वोच्च शक्ति रखता है।
भर्ती नियम-2018 की बाध्यता कार्यपालिका के नीतिगत अधिकार में सीधे दखल देने और सेवा नियमों को बदलने से बचता है। नियमों को असंवैधानिक घोषित कर सकता है अथवा जनहित में 10-15 वर्ष की सेवाओं को देखकर नियम शिथिल कर सकता है।
'उमा देवी (2006)' का विधिक प्रभाव उमा देवी निर्णय के पैराग्राफ 53 के कठोर प्रतिबंधों के कारण नियमितीकरण का आदेश देने में असमर्थ रहता है। निहाल सिंह (2013), एम.एल. केसरी (2010) और विनोद कुमार (2024) की नजीर पर राज्य प्रायोजित शोषण को निरस्त कर सकता है।
नीति निर्माण का परमादेश सरकार को सेवा सुरक्षा कानून या नए स्थायी शैक्षणिक संवर्ग के गठन का बाध्यकारी आदेश नहीं दे सकता। सरकार को हरियाणा की तर्ज पर "Guest Teachers Service Security Act" (58 वर्ष की आयु तक सेवा सुरक्षा) जैसी नीति बनाने का सीधा परमादेश दे सकता है।

भाग 5: विधिक चेतावनी — समय-सीमा और प्रांग्न्याय (Res Judicata) का खतरा

अतिथि शिक्षक संवर्ग के लिए यह समय अत्यधिक सतर्क रहने का है। विधिक प्रक्रियाओं में थोड़ी सी भी असावधानी पूरे संवर्ग के अधिकारों को हमेशा के लिए समाप्त कर सकती है:

1. परिसीमा काल की कठोर समय-सीमा (Limitation Period of 90 Days):

उच्च न्यायालय की खंडपीठ का आदेश पारित होने के पश्चात सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका (Special Leave Petition - SLP under Article 136) प्रस्तुत करने के लिए सांविधिक रूप से केवल 90 दिनों की समय-सीमा निर्धारित होती है। समय बीत जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट में याचिका का विचारणीय होना लगभग असंभव हो जाता है।

2. प्रांग्न्याय (Res Judicata) का विधिक संकट:

यदि मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ के संभावित नकारात्मक या सीमित आदेश को समय रहते सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती नहीं दी गई, तो वह आदेश मध्य प्रदेश राज्य के संपूर्ण अतिथि शिक्षक संवर्ग के लिए अंतिम विधि (Law of the Land) बन जाएगा। इसके पश्चात भविष्य में प्रदेश की किसी भी एकल पीठ अथवा खंडपीठ में सेवा सुरक्षा या नियमितीकरण को लेकर नई याचिका प्रस्तुत करने का विधिक अधिकार सदा-सदा के लिए समाप्त हो जाएगा।

भाग 6: संकल्प, कार्ययोजना एवं साझा विधिक समन्वय

अतिथि शिक्षक साथियों, अब समय मात्र प्रशासनिक ज्ञापनों, जनप्रतिनिधियों के मौखिक आश्वासनों या एकल पीठों से 2-3 महीनों के तात्कालिक 'स्टे' लेकर आत्मसंतोष में रहने का नहीं है। वर्तमान खंडपीठ के विचाराधीन वाद को सर्वोच्च न्यायालय में अंतिम विधिक विजय की आधारशिला मानना होगा।

  • दस्तावेजी मजबूती: डिवीजन बेंच के आदेश, अपने नियुक्ति आदेश, निरंतर सेवा अनुभव प्रमाण-पत्र और वेतन विसंगतियों के अकाट्य प्रमाण अभी से एकत्र करें।
  • संवैधानिक मंच पर एकजुटता: प्रदेश के सभी 73 हजार अतिथि शिक्षक राजनीतिक और गुटीय सीमाओं से ऊपर उठकर साझा विधिक मंच पर संगठित हों।
  • शीर्ष विधिक प्रतिनिधित्व: देश के मूर्धन्य संवैधानिक विधिवेत्ताओं के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में एक अभेद्य एसएलपी (SLP) लगाने हेतु संपूर्ण प्रदेश में विधिक समन्वय स्थापित करें।
व्यवस्थाएं अधिकार मांगने से नहीं देतीं; उन्हें संविधान के सर्वोच्च मंच पर विधिक साक्ष्यों के साथ हासिल करना पड़ता है।

निष्कर्ष: मध्य प्रदेश के अतिथि शिक्षकों का यह संघर्ष केवल एक रोजगार का प्रश्न नहीं, बल्कि लोक कल्याणकारी राज्य में श्रम के सम्मान और संवैधानिक न्याय का परीक्षण है। मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ का यह प्रकरण सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक द्वार खोल रहा है; अब यदि समय रहते सही विधिक रणनीति, समय-सीमा की सतर्कता और साझा संकल्प के साथ सुप्रीम कोर्ट में दस्तक दी गई, तो 73,000 परिवारों को 15 वर्षों के अंधकार से मुक्ति और स्थायी सेवा सुरक्षा मिलना निश्चित है।


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