🌺 एक बार अवश्य पढ़ना, झगड़े करना भूल जाओगे। 🌺
वैदिक परंपरा किसी जातिवाद पर नहीं, अपितु विशुद्ध कर्मवाद पर आधारित है। कृपया इसे पूरा पढ़ें, क्योंकि अधूरा ज्ञान विष से भी अधिक घातक होता है। यह संसार विनिमय के एक अत्यंत कठोर और अकाट्य नियम से संचालित होता है।
1. सृष्टि का अटल विनिमय और जन्म का रहस्य
यह संसार विनिमय के कठोर नियम से संचालित होता है। किसी वैज्ञानिक ने कहा था न—"कोई भी क्रिया लौटकर वापस आती है।" कोई भी जीव जन्म लेने से पहले स्वयं को नहीं जानता; यदि ऐसा होता तो कोई भी अडानी, अंबानी, बिल गेट्स और एलन मस्क की पत्नियों के गर्भ में स्वयं को स्थापित कर लेता।
2. भौतिक विज्ञान की सीमा और शाश्वत आत्म-तत्व
विज्ञान अभी बच्चा है, या यूं कहें कि बेहद अपरिपक्व, अस्पष्ट एवं मिथक से भरा हुआ है। उसे लेकर ये तथाकथित वैज्ञानिक ही विवाद करते रहते हैं और अंत में नया ज्ञान घुसेड़ देते हैं। विश्व के अधिकांश दोपाए जीव अब इस पाखंडी तथाकथित विज्ञान को अंतिम सत्य मानने के स्थान पर त्वरित 'जुगाड़' कहना अधिक पसंद करते हैं।
आज तक विश्व भर में किसी भी शोधकर्ता द्वारा जब वेदप्रणीत सिद्धांत पर अन्वेषण किया गया, तो या तो वह खीझकर मौन हो गया है या उस सत्य को स्वीकार कर लिया, लेकिन मिथ्या न कह सका। भारत में इस वेदप्रणीत सिद्धांत का वंश-परंपरा से चिरकाल से अनुसरण किया जा रहा है, लेकिन आज लोग इसका मतलब ही भूल गए हैं।
यही कारण है कि भारतीय कभी भौतिक अभावग्रस्तता को जीवन की शांति और सत्कर्म के आड़े नहीं आने देते थे। आज भी भभूति लगाए, बिन भोजन पाए, धूनी रमाए दोपाए वेदप्रणीत सिद्धांत का अनुसरण करके मस्त रहते हैं, और एडम स्मिथ के अनुयायी मस्क की सुख-शांति का अता-पता ही नहीं है।
हमारा वैदिक सिद्धांत आत्मा पर आधारित है। यह इसे एक अविनाशी किरण के रूप में प्रतिपादित करता है, जो उस किरण के भीतर व्याप्त 'अक्षर ब्रह्म' से उद्भूत है। समस्त ज्ञात और अज्ञात वही है; मैं भी वही हूँ और तुम भी वही हो। जो बात तथाकथित विज्ञान के वश की नहीं है, कुछ दोपाए इसी विज्ञान में उसका प्रमाण ढूंढते हैं, जो स्वयं में केवल एक जुगाड़ से अधिक कुछ नहीं है।
3. पुनर्जन्म, सूक्ष्म जगत और अकाट्य सत्य
अच्छा विचार करिए, पूरी दुनिया में पुनर्जन्म की घटनाएं घटित होती हैं। वह नवजात बिना किसी पूर्व जानकारी के अपने पूर्वजन्म का एक-एक प्रमाण कैसे दे देता है? अब यह विज्ञान के बूते की बात नहीं है, तो इसमें उस बच्चे का और सत्य मानने वालों का क्या दोष? क्या सत्य को सत्य स्वीकार करना ही पाखंड है?
पूरी दुनिया में भूत-प्रेत की घटनाएं घटित होती हैं, केवल भारत में नहीं। मजे की बात यह है कि अब वैज्ञानिक एक ऐसे तत्व की बात कर रहे हैं जिस पर अभी नोबेल पुरस्कार दिया गया है; वह न्यूट्रॉन, प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉन आदि ज्ञात तत्वों से परे है।
इसका मतलब यह हुआ कि जब तक कुछ ढूँढा जाए, उससे पहले स्थापित सिद्धांतों की बलि देकर इन बेवकूफों का अनुयायी बनकर स्वयं को मानसिक रोगी घोषित कर दिया जाए? मानो पागलों का झुंड कह रहा हो कि हम ही विद्वान हैं!
जी हाँ, वैदिक परंपरा आत्म-तत्व, पुनर्जन्म और जन्म-बंधन अर्थात कर्म-बंधन की मुक्ति पर आधारित है। यह अकाट्य सत्य है और तथाकथित विज्ञान की कल्पना से भी परे है। इसके लिए तथाकथित वैज्ञानिकों के अप्रूवल (प्रमाणीकरण) की कोई आवश्यकता नहीं है। मुझे पता है कि यदि मैं अभी भी मूल विषय पर आया तो कुछ लोग अपनी खोपड़ी की चाशनी बनाकर चाटना शुरू कर देंगे, फिर भी मैं लेख लंबा होने के डर से आगे बढ़ता हूँ।
4. जीव स्वयं अपना इंजीनियर: कारण, परिणाम और चातुर्वर्ण्य
हम जिसे जन्म कह रहे हैं, वही हमारे कर्म का परिणाम है। जैसे लौकिक जीवन में हर कार्य का एक कारण होता है और हर कारण से विविध संयोगवश विविध परिणाम होते हैं—यह संयोग एक परिणाम ही होता है, जिससे कारण और संयोग से फिर एक नया परिणाम उत्पन्न होता है। प्रत्येक परिणाम की अनुभूति ही सुख-दुख है, और बार-बार जन्म लेना इसी परिणाम का कारण है। इसी प्रकार कोई भी जन्म पहले के कर्म का परिणाम है और इस परिणाम अर्थात जन्म का कोई न कोई कारण अवश्य है।
यह कोई इलेक्ट्रिसिटी या सॉफ्टवेयर की प्री-फिक्स वायरिंग नहीं है, बल्कि हर जीव स्वयं अपना इंजीनियर है। वह स्वयं को कितना जानता है, यह भी उसके इस कर्म अर्थात इंजीनियरिंग का ही फल है; जैसे सभी को अपना भूत याद नहीं रहता और सभी को भविष्य के संकेत नहीं प्राप्त होते। जब तक कारण रहेगा तब तक परिणाम होगा (अर्थात जन्म होगा), जब तक परिणाम होगा तब तक कारण बना रहेगा (अर्थात जन्म होता रहेगा)—यही कर्म-बंधन है।
जो आज स्वयं को अमीर से गरीब और गरीब से अमीर होते देख रहे हैं, उसका भी कारण है। जो स्वयं पर ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य होने पर इतरा रहे हैं, उसका भी कारण है। जो स्वयं सम्मान से वंचित होकर और प्रतिस्पर्धा में पिछड़कर तिलमिला जाते हैं, उसका भी कारण है। अनर्गल कामों के जरिए अपना अभिमान बढ़ाकर, अपनी खीझ का प्रतिशोध लेकर भी जो कर्म कर रहे हैं, उसका भी कारण और परिणाम होगा। यहाँ से वैदिक सिद्धांत आगे बढ़कर वैदिक ज्ञान में परिणित होता है।
मेरे मित्रों! हमें आत्मोन्नति, अर्थात इस देह से ऐसे कर्म करने चाहिए जो भीतर से स्वयं का कल्याण करने वाले हों। हमें ईर्ष्या-द्वेष के वशीभूत होकर ऐसे कर्म नहीं करने चाहिए जो दुखद परिणाम उत्पन्न करें। अन्यथा हम मरेंगे और अगला जन्म आज से भी दुर्गतिमय हो जाएगा; हम यूं ही खीझ में अनर्गल कर्म करेंगे और पतन की अनंत गहराई में डूबते जाएंगे।
विज्ञान भी कुछ हद तक इस बात को समझ गया है कि हम इस प्रकृति का उपयोग करते हैं; यह प्रकृति देने में जितनी उदार है, लेने में भी उतनी ही कठोर है। यह पाई-पाई का हिसाब लेकर ही मानती है, इसलिए हमें लेने के बजाय देना शुरू करना होगा। यही कर्म हमें ऋणी और लुटेरा बनाते हैं, यही कर्म हमें दाता और धनी बनाते हैं। हम बार-बार अपना ऋण चुकता करने के लिए ही जन्म लेते रहते हैं। भला बताओ, कर्ज चुकाने में सारा जीवन और कई जन्म निकल जाएं और हम सुख की इच्छा रूपी एक नया कारण बनाते जाएं—इसी को कहते हैं जीते-जी नरक!
मित्रों! आज जो ब्राह्मण है, कल शूद्र हो सकता है; जो शूद्र है, वह विदेश में जन्म ले सकता है; कोई वैश्य, क्षत्रिय या ब्राह्मण पशु बन सकता है; कोई शूद्र प्रतिष्ठित परिवार में जन्म ले सकता है। सब कुछ कर्मों का फल है, जिसके जैसे कर्म उसका वैसा स्वरूप। मेरे भाई! इसलिए केवल सत्कर्म ही आनंद और ऐश्वर्य का मार्ग है।
इसलिए आज से अपने जन्म का रोना-धोना छोड़ दो। वेदप्रतिपादित सत्कर्म करो। चातुर्वर्ण्य की यह व्यवस्था दैहिक है, इसे स्वीकार करो; यह स्थायी नहीं, कर्मबंधन मात्र है। वेदप्रतिपादित सत्कर्म करो, इसके अतिरिक्त कोई सिद्धांत समर्थ नहीं है।
5. वेदों का मूल विषय, लुप्त विद्या और व्यावहारिक शिक्षा
यह जानकर हैरान हो जाओगे कि जैसे संसार की समस्त नदियां समुद्र में आकर मिल जाती हैं, वैसे ही समस्त मत-मतांतर अंत में इस धर्मसिंधु में आकर ही आगे बढ़ते हैं, क्योंकि वैदिक वांग्मय ही विज्ञान है। आज मेरी बात कुछ लोगों को बुरी लगेगी, लेकिन जब कभी तथाकथित विज्ञान में यह सिद्ध हो जाएगा तब हाथ मलोगे, सिर धुनोगे।
कुछ लोग कहेंगे कि वेद इतना ही वैज्ञानिक है तो मोबाइल और मिसाइल क्यों नहीं बना लिया? तो सुनो मेरे भाई! यह वेद का मूल नहीं, सांसारिक विषय है—अर्थात गौण विषय है।
लेखन की परंपरा का विकास बहुत बाद में हुआ है, लेकिन भारत में परंपरागत रूप से श्रुति-ज्ञान की परंपरा रही है। तभी भारत में चमड़े, लोहे, लकड़ी, रेशे, धातु, रत्न, यंत्र, पुष्पक विमान, अंतर्ज्ञान, दिव्यास्त्र आदि के उन्नत उदाहरण विद्यमान हैं, जिनकी आज का तथाकथित विज्ञान कल्पना भी नहीं कर सकता। यहाँ केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ही नहीं, हर व्यक्ति परंपरागत रूप से उन्नत रूप से शिक्षित था—बढ़ई अपने बच्चे को प्रत्यक्ष काम दिखाकर और समझाकर पढ़ाता था, इस प्रकार हर व्यक्ति कार्यकुशल और शिक्षित था।
कालांतर में अनाचार को व्याप्त होता देख हमारे पूर्वजों ने ऐसे सभी तकनीक और संहारक ज्ञान को सार्वजनिक रूप से कहना बंद कर दिया और लेखन में उनका समावेश ही नहीं किया गया। कुछ लिपिबद्ध ज्ञान आक्रांताओं ने अपने कब्जे में ले लिया और नष्ट कर दिया।
6. शाश्वत ज्ञान और हिमालयी चेतना
संपूर्ण ज्ञान आज भी हिमालय में और देहस्थ विद्यमान पवनसुत श्री हनुमान जी के पास विद्यमान है।
निष्कर्ष: जाति, कुल या जन्म केवल इस नश्वर देह के क्षणिक वस्त्र हैं; आत्मा का वास्तविक स्वरूप केवल उसका कर्म है। भौतिक विज्ञान के सतही भ्रम और जन्मगत अहंकार को त्यागकर, प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होकर वेद-सम्मत सत्कर्म के मार्ग पर चलना ही इस भव-बंधन से मुक्ति और परमानंद का एकमात्र सनातन वैदिक मार्ग है।